ललितपुर। सवा पांच करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं श्री रूद्रमहायज्ञ आयोजन में द्धितीय सावन सोमवार को श्रद्धालुओं ने 45 लाख पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया। प्रातःकालीन बेला में श्रीरूद्रमहायज्ञ का पीठ पूजन व पंचांग पूजन वैदिक विद्वानों द्वारा किया गया। द्धितीय सावन सोमवार को भोले की भक्ति का आनंद लेने के लिए भक्तो का हुजूम श्री सिद्धपीठ चंडी मंदिर धाम पर उमड़ पड़ा। पूर्ण भक्ति भाव से श्रद्धालुओं ने पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया। वहीं अपरान्ह में पार्थिव शिवलिंग का महारूद्र अभिषेक प्रधान यजमान हरिशंकर साहू सहित अन्य यजमान आदि द्वारा किया गया। भक्तों को श्री शिवमहापुराण की कथा सुनाते हुए परमपूज्य अनंतविभूषित चंडीपीठाधीश्वराचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी चन्द्रेश्वर गिरि महाराज जी ने कहाकि सकारात्मक मन से महत्त्वपूर्ण है। शांत मन होना। शांत मन निर्णय,विश्लेषण ओैर व्याख्या की सीमा से परे होता है। जब आप जीवन के सारे वैषम्य स्वीकार कर लेते हैं, तो आप सुख और दुःख के किनारों के बीच, बिना किसी एक से अटके, सहजता से तैर सकते हैं। और, यही असली स्वाधीनता की प्राप्ति है। पुण्य स्थायी प्रसन्नता देता है। चिर-स्थायी प्रसन्नता की मूल कुंजी है-विवेक। प्रसन्नता प्राप्ति का मुख्य रहस्य यह है कि मनुष्य अपने लिए सुख की कामना छोड़कर अपना जीवन दूसरों की प्रसन्नता में योजित करे। दूसरों को प्रसन्न करने के प्रयत्न करने में जो कष्ट भी प्राप्त होता है वह भी प्रसन्नता ही देता है। इतिहास ऐसे बलिदानियों से भरा पड़ा है कि जिस समय उनको मृत्यु वेदी पर प्राण हरण के लिये लाया गया उस समय उनके मुख पर जो आह्लाद, जो तेज, जो मुस्कान और जो प्रसन्नता देखी गई, वह काल के अनन्त पृष्ठ पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गई है। एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी अपने जीवन की किसी न किसी ऐसी घटना का स्मरण करके समझ सकता है कि जब उसने कोई परोपकार का काम किया था तब उसके हृदय में प्रसन्नता की कितनी गहरी अनुभूति हुई थी। प्रसन्नता पदार्थ सापेक्ष नहीं, अपितु विचार सापेक्ष है। चिर-स्थायी प्रसन्नता का मूल-आधार आध्यात्मिक चिन्तन में निहित है। अतः सत्संग-स्वाध्याय एवं सत्पुरुषों का अनुशीलन ही श्रेयस्कर है …। श्री शिवमहापुराण की महाआरती प्रधान यजमान राजेश्वरी सिसौदिया द्धारा की गई। इस दौरान कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।



